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दिनांक 4 अप्रैल 2019 सांय 4:15 से 5:30 तक आठवीं अर्धवार्षिक बैठक स्थान: होटल चंदीराम, छावनी चौराहा | दिनांक 4 अप्रैल 2019 सांय 5:30 से 8:00 तक "हास्य कवि सम्मेलन" स्थान: होटल चांदीराम छावनी चौराया | दिनांक 19 मार्च 2019 को नराकास(बैंक) कोटा के तत्वावधान में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा कार्यशाला, राजभाषा ज्ञान प्रतियोगिता एवं उप-समिति की बैठक का आयोजन | नराकास के तत्वाधान में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा हिंदी निबंध प्रतियोगिता का आयोजन | चम्बल भारती के पांचवें अंक हेतु ऑनलाइन रचनाएँ प्रेषित करें | नराकास कोटा(बैंक) की सांतवीं बैठक दिनांक 06 सितम्बर 2018 का कार्यवृत्त |

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श्रीमत रुपम कुमारी, पत्नी श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

नारी शक्ति : अधूरा सच

 

फख्र है हमें अपनी आजादी पर
अपने देश अपनी संस्कृति पर...
पर विश्लेषण कीजिए पुनः उस रास्ते का
जिससे गुजर कर पहुँचे हम इस मुकाम तक ...
कितना सा फर्क है उस जमाने में,

जब असूर्यपश्या होना  नारी का  थी गर्व की बात
और आज जब नारी सर्वोच्च शिखर पर पहुँची है...
पर कितनी?
बातें हैं ये अपवाद की और अपवाद से बनते नहीं सिद्धांत...
आज भी है बाहुल्य उन परिवारों का
जहाँ घुट्टी में पिलाया जाता है
आदर्श और शील सिर्फ नारियों को संस्कार के नाम पर...
ताकि जा कर पराये घर करें नाम रोशन
जो इंसान नहीं बन जाएँ मूरत संगमरमर की  अवगुण रहित...
जिंदगी बीत जाती है  पहले सीखने में
फिर अमल करने फिर सिखाने में...
वक्त ही नहीं बचता  कि जियें वो खुद के लिए
सपने देखें या साकार करें...
शायद आप स्मित हास्य के साथ सोच रहे होंगे
''
अजी कहोगी क्यों नहीं,
आखिरकार तुम भी उनमें से ही एक हो।''

श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

डिजिटल बैंकिंग में नए आयाम

 

आज जहाँ डिजिटल तकनीकें भारत में जन-जन तक पहुँच रही हैं, वहीं इसके विकास के चरणों की अक्सर अवहेलना कर दी जाती है कि कैसे अल्पावधि में ही भारत ने इस क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। डिजिटल आधारभूत संरचना के मजबूत होने से वित्तीय कार्यों में तीव्रता आई है। यही वजह है कि निकट भविष्य में महत्वपूर्ण उत्पादकता विकास का अनुमान लगाना संभव हो सका है। भारत के डिजिटल ढाँचे की नींव मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिकी है जिसे 'जैम त्रिमूर्ति'(JAM TRINITY) कहा जाता है। ये तीन स्तम्भ हैं- जन धन बैंक खाते, आधार जैवमितीय प्रणाली और मोबाइल संचार का विकास। इन तीनों प्रमुख घटकों के अलावा कुछ और तत्व भी डिजिटल संरचना को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख हैं- पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) एवं यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI)

PFMS जहाँ प्रसंस्करण, निगरानी, प्रवर्तन, लेखांकन, विवेचना और रिपोर्ट तैयार करने में मददगार साबित हो रहा है वहीं UPI एक ऐसा मंच है जहाँ समान या विभिन्न बैंकों के किसी भी दो खतों में वित्त का वास्तविक समय हस्तांतरण कर सकते हैं। UPI राष्ट्रीय भुगतान कॅारपोरेशन के द्वारा निर्मित और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित की गई है। भारत के लगभग सभी बैंकों के राष्ट्रीय, राजकीय, चालू और व्यावसायिक खाते इससे जुड़कर संचालित होने में सक्षम हैं। UPI की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा प्रेषक और प्राप्तकर्ता भिन्न मोबाइल एप का प्रयोग करते हुए भी, इसके विभिन्न प्रयोक्ता इंटरफेस की सुविधा के तहत आसानी से विनिमय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के प्रयोग से बिना किसी माध्यमिक हस्तक्षेप के सरकार सीधे राज्य सरकार या किसी भी अपेक्षित व्यक्ति विशेष तक वित्तीय सहायता प्रदान करने में सक्षम है। इन वित्तीय माध्यमों से वर्तमान में क्रेडिट और वीसा कार्डों की भाँति कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता, जिसकी वजह से यह संभावना बन रही है कि यह व्यवस्था निकट भविष्य में विभिन्न प्रकार के कार्डों को विस्थापित कर दें।  गैर-सरकारी विभागों ने इस व्यवस्था को अपने व्यावसायिक उपयोग और उपभोक्ता विनिमय के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया है तथा इसके लिए विभिन्न UPI आधारित उपादानों और वॅालेट का उपयोग बहुतायत से कर रहे हैं । दूरसंचार जगत में जीओ नेटवर्क के आ जाने से तीव्र गति इंटरनेट की दर में गिरावट की वजह से भारत हालिया कुछ वर्षों में दुनिया के सर्वाधिक डाटा उपभोक्ताओं में से एक बन गया है ।  

गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क(GSTN) भी भारत के डिजिटल ढाँचे के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरा है, जिसमें एक करोड़ से भी अधिक टैक्स भुगतानकर्ताओं को सूचीबद्ध किया गया है। बैंक इस सुविधा का उपयोग ऋण व्यवसाय के मूल्यांकन के लिए भी कर रहे हैं। हाल ही में एक ऑनलाइन ऋण स्वीकृति मंच बनाया गया है जो सरकारी बैंकों को छोटे व मध्यम आकार के ऋणों को व्यवस्थित करने में मदद कर रहा है ।  GSTN द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों की सहायता से एक घंटे से भी कम समय में ऋण प्रसंस्करण एवं स्वीकृति की प्रक्रिया को पूर्ण किया जा सकता है ।

निष्कर्षतः डिजिटल वातावरण के विकास में कुछ प्रतिकूल अवरोध मौजूद होने के बावजूद हालिया वर्षों में किए जा रहे अथक प्रयास रंग ला रहे हैं और अल्पावधि में ही डिजिटल संरचना और व्यावसायिक प्रगति में अभूतपूर्व सफलता दर्ज की गई है जो भारत में विदेशी तकनीकों और निवेशकों के आगमन की भी असीम संभावनाओं के द्वार खोल रहा है ।

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन

 

वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना|

वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना|

वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना|

वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना|

वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना|

वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना|

 

वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना|

वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना|

वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना|

वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना|

वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना|

वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना|

वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना|

वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना|

वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना|

वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना|

यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें  भरना|

 

जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं|

 

क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ?

 

क्यूँ ........ आखिर क्यूँ !!!

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है


आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है,
पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है।
नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है,
पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है।

बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे,
ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है।

सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी,
कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है।

नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ,
पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है।

मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर,
पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है।

यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है,
पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है।

हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान,
पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है।

भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से,
नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है


आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है,
पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है।
नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है,
पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है।

बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे,
ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है।

सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी,
कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है।

नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ,
पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है।

मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर,
पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है।

यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है,
पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है।

हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान,
पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है।

भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से,
नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

पहचान

 

ख़ुद को बना चट्टान तूकर माह को रमज़ान तू।

माता, बहिन, पत्नी, पुत्री, ख़ुद की बना पहचान तू।

शमशीर ख़ुद को तू बना, डर तोड़ बन तूफान तू।

है देवियों का रूप तू, गीता एवं कुरआन तू।

जो मौत को भी मात दे, उस देश का गुण-गान तू।

हैवान का भुगतान हो, आगे बड़ा फ़रमान तू।

कु. पूर्वी खत्री
भारतीय स्टेट बैंक , प्रशासनिक कार्यालय
उप-प्रबंधक

बैंकों में बढ़ता एनपीए : कारण और निवारण

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बैंक रीढ़ की हड्डी की तरह हैं। भारत की अर्थ व्यवस्था , विभिन्न विभागो मे हमारे विकास एवम विस्तार के लिए जिस वित्तीय सहायता की आवश्यकता है वो केवल बैंक ही दे सकते हैं। ऐसे में बैंकों की बढ़ रही गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) केवल बैंकों के लिए ही नहीं, समूची अर्थ व्यवस्था के लिए नुकसानदेह हैएनपीए के विषय मे, इसके कारण आदि के बारे मे गहराई से चर्चा करने से पूर्व हमे यह समझना चाहिए की क्या है एनपीए।

क्या है एनपीए?

बैंक का वो कर्ज जो डूब गया हो और जिसे फिर से वापस आने की उम्मीद नहीं के बराबर हो उसे एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) कहा जाता है। अमूमन अगर बैंक को कर्ज की किश्त 3 महीने पर नहीं आती है तो उस अकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया जाता है। हमारे बैंकों का 10 फीसदी से ज्यादा कर्ज एनपीए है। बढ़ता एनपीए बैंकों के ऋण देने की क्षमता को प्रभावित करता है तथा उनके मुनाफे में कमी आती है।  

बैंकों का पैसा डूबने का सीधा मतलब है कि बैंक के पास कर्ज देने की रकम में कमी, और कर्ज देने की रफ्तार में कमी का मतलब है अर्थव्यवस्था में सुस्ती और अर्थ अयवस्था का हमारे विकास पर क्या प्रभाव इससे हम सब भली भांति अवगत हैं।

अतः यह स्पष्ट है की एनपीए हमारे बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बहुत ही बड़ी चिंता का विषय है तथा इसका निवारण अनिवार्य है। परंतु इसके निवारण पर चर्चा करने का मतलब तभी है जब हम समझ ले की भारतीय बैंकों मे बढ़ते एनपीए के प्रमुख कारण क्या है?

एनपीए के कारण

आज हमारे बैंकों मे मुख्यतः औद्योगिक क्षेत्रो विशेषतः मेटल, सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, टेक्सटाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि सैक्टर मे दिये गए लोन मे एनपीए बढ़ा है।एनपीए में उद्योग जगत और बड़ी कंपनियों का योगदान सबसे ज्यादा है।

एनपीए के कुछ प्रमुख कारण निम्न हैं :

1.       बड़ी परियोजनाओ व सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओ कि सफलता को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया कर्ज एनपीए के प्रमुख कारणो मे से एक है।परियोजना के पूरा होने में विलम्ब के कारण ब्याज तथा मूलधन की किश्त भुगतान में देरी होती है, जिससे लोन एनपीए श्रेणी मे आ जाता है

2.       कर्ज माफी के बाद कृषि क्षेत्र मे भी एनपीए कि स्थिति गंभीर हो गयी है। किसान अगली कर्ज माफी का इंतज़ार करते हैं तथा समय पर अपनी बकाया राशि व किश्त का भुगतान नही करते।

3.       ब्याज दरों में बृद्धि के कारण किश्त भुगतान में कठिनाई।

4.       बाजार में मौजूद अनिश्चितता के कारण जिन लोगों ने ऋण लिए हैं उनके द्वारा ऋण न चुका पाना।

5.  जान बूझकर ऋण न चुकाने (willful defaulter)  वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होना और ऐसे बकायेदारों के खिलाफ राजनीतिक दखल के कारण पर्याप्त कार्यवाही न हो पाना।

 

ध्यान देने वाली बात यह है कि बढ़ते एनपीए वाले क्षेत्रो मे ज़्यादातर क्षेत्र वो हैं जिनकी सेहत देश की विकास दर से जुड़ी हुई है। मतलब यह कि विकास दर अगर तेज होती है तो इन सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों की सेहत बेहतर होती है और लोन चुकाने की क्षमता भी। अतः यह बात साफ है कि बैंकों के एनपीए कम करने का अचूक उपाय है देश कि विकास मे वृद्धि हो, परंतु यह वृद्धि भी कई कारणो पर निर्भर करती है।

तो आए अब बैंकों मे बढ़ते एनपीए को कम करने के संभव उपायो पर चर्चा कर लें।

 

एनपीए के निवारण

·         बैंकों का रिकैपिटलाइजेशन इसका एक उपाय है। बैंकों कि माली हालत सुधारने के लिए भारत सरकार ने समय समय पर बैंकों को अतिरिक्त पूंजी देने कि घोषणा कि है। पुनर्पूंजीकरण बैंकों के पूंजी आधार को मजबूत करेगा। इससे बैंकों का मुनाफा बढ़ेगा तथा रकम का प्रवाह घटने के खतरे को कम कर उन्हें दिवालिया होने से बचाया जा सकेगा।

·         समय-समय पर पुनर्पूंजीकरण के साथ सरकारी बैंको के कामकाज को और पारदर्शी बनाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

·         सरकार और आरबीआई की सहभागिता से समता अंश योगदान के जरिए एक संपत्ति पुनर्निमार्ण कंपनी (एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन कंपनी) का गठन हो, जो बैंकिंग क्षेत्र से एनपीए को खत्म कर सके।

·         किसी कंपनी को ऋण स्वीकृत करने से पहले उसकी वित्तीय स्थिति और परियोजना की व्यावहारिकता की निष्पक्ष जांच हो तथा बगैर पर्याप्त सुरक्षा और बंधक के कोई ऋण स्वीकृत न हो।

अतः यह बात साफ है कि बैंकों मे एनपीए कैंसर बीमारी के समान है , परंतु लाइलाज नही। बैंकों मे भी इसके निवारण करने कि ओर रुचि बढ़ रही है जो कि एक अच्छा संकेत है। यदि सही गति एवम पारदर्शी नीतियो से , सरकार के बेवजह हस्तक्षेप पर रोक लगा के ,मानव संसाधनो की बदोतरी आदि कदमो के साथ आगे बढ़ा जाए तो एनपीए पर निश्चित रूप से काबू पाया जा सकता है। यह राह कठिन जरूर है, परंतु यह हमे देश की तरक्की एवम विकास की ओर ले कर जाती है। अतः यह सही समय है की इस समस्या को गंभीरता से लें तथा ऐसी नीतिया बनाई जाए जो एनपीए पर रोक लगाने मे सक्षम हो।

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना| वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना| वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना| वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना| वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना| वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना| वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना| वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना| वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना| वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना| वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना| वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना| वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना| वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना| वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना| वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना| यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें भरना| जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं| क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ? क्यूँ ........ आखिर क्यूँ !!!

श्रीमती रुपम कुमारी पत्नी श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

नारी शक्ति : अधूरा सच फख्र है हमें अपनी आजादी पर अपने देश अपनी संस्कृति पर... पर विश्लेषण कीजिए पुनः उस रास्ते का जिससे गुजर कर पहुँचे हम इस मुकाम तक ... कितना सा फर्क है उस जमाने में, जब असूर्यपश्या होना नारी का थी गर्व की बात और आज जब नारी सर्वोच्च शिखर पर पहुँची है... पर कितनी? बातें हैं ये अपवाद की और अपवाद से बनते नहीं सिद्धांत... आज भी है बाहुल्य उन परिवारों का जहाँ घुट्टी में पिलाया जाता है आदर्श और शील सिर्फ नारियों को संस्कार के नाम पर... ताकि जा कर पराये घर करें नाम रोशन जो इंसान नहीं बन जाएँ मूरत संगमरमर की अवगुण रहित... जिंदगी बीत जाती है पहले सीखने में फिर अमल करने फिर सिखाने में... वक्त ही नहीं बचता कि जियें वो खुद के लिए सपने देखें या साकार करें... शायद आप स्मित हास्य के साथ सोच रहे होंगे ''अजी कहोगी क्यों नहीं, आखिरकार तुम भी उनमें से ही एक हो।''

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना| वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना| वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना| वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना| वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना| वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना| वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना| वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना| वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना| वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना| वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना| वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना| वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना| वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना| वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना| वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना| यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें भरना| जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं| क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ? क्यूँ आखिर क्यूँ ......

श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

डिजिटल बैंकिंग में नए आयाम आज जहाँ डिजिटल तकनीकें भारत में जन-जन तक पहुँच रही हैं, वहीं इसके विकास के चरणों की अक्सर अवहेलना कर दी जाती है कि कैसे अल्पावधि में ही भारत ने इस क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। डिजिटल आधारभूत संरचना के मजबूत होने से वित्तीय कार्यों में तीव्रता आई है। यही वजह है कि निकट भविष्य में महत्वपूर्ण उत्पादकता विकास का अनुमान लगाना संभव हो सका है। भारत के डिजिटल ढाँचे की नींव मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिकी है जिसे 'जैम त्रिमूर्ति'(JAM TRINITY) कहा जाता है। ये तीन स्तम्भ हैं- जन धन बैंक खाते, आधार जैवमितीय प्रणाली और मोबाइल संचार का विकास। इन तीनों प्रमुख घटकों के अलावा कुछ और तत्व भी डिजिटल संरचना को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख हैं- पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) एवं यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI)। PFMS जहाँ प्रसंस्करण, निगरानी, प्रवर्तन, लेखांकन, विवेचना और रिपोर्ट तैयार करने में मददगार साबित हो रहा है वहीं UPI एक ऐसा मंच है जहाँ समान या विभिन्न बैंकों के किसी भी दो खतों में वित्त का वास्तविक समय हस्तांतरण कर सकते हैं। UPI राष्ट्रीय भुगतान कॅारपोरेशन के द्वारा निर्मित और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित की गई है। भारत के लगभग सभी बैंकों के राष्ट्रीय, राजकीय, चालू और व्यावसायिक खाते इससे जुड़कर संचालित होने में सक्षम हैं। UPI की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा प्रेषक और प्राप्तकर्ता भिन्न मोबाइल एप का प्रयोग करते हुए भी, इसके विभिन्न प्रयोक्ता इंटरफेस की सुविधा के तहत आसानी से विनिमय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के प्रयोग से बिना किसी माध्यमिक हस्तक्षेप के सरकार सीधे राज्य सरकार या किसी भी अपेक्षित व्यक्ति विशेष तक वित्तीय सहायता प्रदान करने में सक्षम है। इन वित्तीय माध्यमों से वर्तमान में क्रेडिट और वीसा कार्डों की भाँति कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता, जिसकी वजह से यह संभावना बन रही है कि यह व्यवस्था निकट भविष्य में विभिन्न प्रकार के कार्डों को विस्थापित कर दें। गैर-सरकारी विभागों ने इस व्यवस्था को अपने व्यावसायिक उपयोग और उपभोक्ता विनिमय के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया है तथा इसके लिए विभिन्न UPI आधारित उपादानों और वॅालेट का उपयोग बहुतायत से कर रहे हैं । दूरसंचार जगत में जीओ नेटवर्क के आ जाने से तीव्र गति इंटरनेट की दर में गिरावट की वजह से भारत हालिया कुछ वर्षों में दुनिया के सर्वाधिक डाटा उपभोक्ताओं में से एक बन गया है । गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क(GSTN) भी भारत के डिजिटल ढाँचे के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरा है, जिसमें एक करोड़ से भी अधिक टैक्स भुगतानकर्ताओं को सूचीबद्ध किया गया है। बैंक इस सुविधा का उपयोग ऋण व्यवसाय के मूल्यांकन के लिए भी कर रहे हैं। हाल ही में एक ऑनलाइन ऋण स्वीकृति मंच बनाया गया है जो सरकारी बैंकों को छोटे व मध्यम आकार के ऋणों को व्यवस्थित करने में मदद कर रहा है । GSTN द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों की सहायता से एक घंटे से भी कम समय में ऋण प्रसंस्करण एवं स्वीकृति की प्रक्रिया को पूर्ण किया जा सकता है । निष्कर्षतः डिजिटल वातावरण के विकास में कुछ प्रतिकूल अवरोध मौजूद होने के बावजूद हालिया वर्षों में किए जा रहे अथक प्रयास रंग ला रहे हैं और अल्पावधि में ही डिजिटल संरचना और व्यावसायिक प्रगति में अभूतपूर्व सफलता दर्ज की गई है जो भारत में विदेशी तकनीकों और निवेशकों के आगमन की भी असीम संभावनाओं के द्वार खोल रहा है ।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है, पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है। नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है, पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है। बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे, ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है। सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी, कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है। नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ, पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है। मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर, पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है। यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है, पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है। हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान, पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है। भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से, नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

पहचान ख़ुद को बना चट्टान तू, कर माह को रमज़ान तू। माता, बहिन, पत्नी, पुत्री, ख़ुद की बना पहचान तू। शमशीर ख़ुद को तू बना, डर तोड़ बन तूफान तू। है देवियों का रूप तू, गीता एवं कुरआन तू। जो मौत को भी मात दे, उस देश का गुण-गान तू। हैवान का भुगतान हो, आगे बड़ा फ़रमान तू।

नेहा अमेय रानडे
भारतीय स्टेट बैंक ,
वरिष्ठ सहायक

जिंदगी तू ही बता, कैसी है तू ? कभी फूलों सी सुंदर
कभी काँटों सी सख्त है,
कभी रिमझिम बरसात सुहानी
कभी अंगारों का तख्त है ।
कभी सजतें मेले, मुस्कानों के तुझमें
कभी सन्नाटें, बेवक्त है,
कभी लहराती है, विजयपताका
कभी गहरी, शिकस्त है ।
कहीं कोई बिछड़ जाता है तुझसे
कहीं नाता नया बनाता है,
आने-जाने की कहानी सारी,
तेरा वक्त ही, सुनाता है ।
भूल न जाऊँ भगवान को अपने
इतना ही, सुख देती है,
विश्वास करूँ, अपने कर्मों पर
इसलिए दु:ख भी, देती है ।
उम्मीदों से हरा-भरा है
तेरा आँगन सुनहरा,
बच्चों की किलकारी सुनकर
धुल जाता है, मन भी मैला ।
आसमानी ऊंचाई भी तेरी
समुंदर की गहराई भी,
अपूर्तता का मातम भी तेरा
खुशियों की, शहनाई भी ।
जब लगती तू, सरल सहज है
नया मोड दिखलाती है,
गिरते-उठते चलना सीखूँ
तभी दौड़ तू, लगाती है ।
अदना सा मैं बालक तेरा
तुझें, मैं, न समझ पाऊँ,
तेरे अद्भुत अनुभवों से
सींख मैं, लेना चाहूँ,
सींख मैं, लेना चाहूँ ।