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नेहा अमेय रानडे
भारतीय स्टेट बैंक , वरिष्ठ सहायक

जिंदगी तू ही बता, कैसी है तू ? कभी फूलों सी सुंदर
कभी काँटों सी सख्त है,
कभी रिमझिम बरसात सुहानी
कभी अंगारों का तख्त है ।
कभी सजतें मेले, मुस्कानों के तुझमें
कभी सन्नाटें, बेवक्त है,
कभी लहराती है, विजयपताका
कभी गहरी, शिकस्त है ।
कहीं कोई बिछड़ जाता है तुझसे
कहीं नाता नया बनाता है,
आने-जाने की कहानी सारी,
तेरा वक्त ही, सुनाता है ।
भूल न जाऊँ भगवान को अपने
इतना ही, सुख देती है,
विश्वास करूँ, अपने कर्मों पर
इसलिए दु:ख भी, देती है ।
उम्मीदों से हरा-भरा है
तेरा आँगन सुनहरा,
बच्चों की किलकारी सुनकर
धुल जाता है, मन भी मैला ।
आसमानी ऊंचाई भी तेरी
समुंदर की गहराई भी,
अपूर्तता का मातम भी तेरा
खुशियों की, शहनाई भी ।
जब लगती तू, सरल सहज है
नया मोड दिखलाती है,
गिरते-उठते चलना सीखूँ
तभी दौड़ तू, लगाती है ।
अदना सा मैं बालक तेरा
तुझें, मैं, न समझ पाऊँ,
तेरे अद्भुत अनुभवों से
सींख मैं, लेना चाहूँ,
सींख मैं, लेना चाहूँ ।