नवीनतम समाचार
अर्धवार्षिक राजभाषा प्रगति रिपोर्ट भेजने की अंतिम दिनांक 5 सितंबर है l नराकास कोटा बैंक के तत्वाधान में दिनांक 26 अगस्त 2019 को बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा बैंकिंग प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन l बड़ौदा राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक द्वारा आयोजित कविता लेखन प्रतियोगिता के अंतिम राउंड हेतु कविता प्रेषित करने की अंतिम दिनांक 13 अगस्त 2019 है l वित्तीय वर्ष 2019-20 के अंशदान हेतु अंतिम दिनांक 30 अप्रेल 2019 है । चम्बल भारती पत्रिका हेतु रचनाओं के प्रेषण की अंतिम दिनांक 30 अप्रेल 2019 है । दिनांक 4 अप्रैल 2019 सांय 4:15 से 5:30 तक आठवीं अर्धवार्षिक बैठक स्थान: होटल चंदीराम, छावनी चौराहा | दिनांक 4 अप्रैल 2019 सांय 5:30 से 8:00 तक "हास्य कवि सम्मेलन" स्थान: होटल चांदीराम छावनी चौराया | दिनांक 19 मार्च 2019 को नराकास(बैंक) कोटा के तत्वावधान में भारतीय स्टेट बैंक द्वारा कार्यशाला, राजभाषा ज्ञान प्रतियोगिता एवं उप-समिति की बैठक का आयोजन | नराकास के तत्वाधान में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया द्वारा हिंदी निबंध प्रतियोगिता का आयोजन | चम्बल भारती के पांचवें अंक हेतु ऑनलाइन रचनाएँ प्रेषित करें | नराकास कोटा(बैंक) की सांतवीं बैठक दिनांक 06 सितम्बर 2018 का कार्यवृत्त |

रचना देखें

अजय गौतम
केनरा बैंक , मुख्य शाखा बारा रोड
एकल खिड़की परिचालक

चन्द्र का आह्वान

 

एक ही माँ के सुत जो कहलाते हैं,

एक दिनकर एक निशाकर कहाते हैं |

      चाँद को पाना लालसा सदियों पुरानी है,

      चरखे ओर बुढ़िया की कहानी अब भी सुहानी है |

समय का अन्तराल था , बेटे के मन में उठा वही सवाल था ,

खोज कर लाना है , चन्द्रमा के अद्भुत खज़ाने,

श्री हरिकोटा में जुटा एक परिवार चन्द्रयान बनाने |

      ‘इसरो’ कुटुम्ब के मुखिया ‘सिवान’ ने,

      भानुमति सम जोड़ लिया ‘विक्रम’ ओर ‘प्रज्ञान’ में |

उत्तम तिथि निश्चित हुई प्रक्षेपण कर डाला ,

भारत के रत्नों ने फिर इतिहास बदल डाला |

      भेजा चन्द्रयान को लाने मिट्टी के नमूने ,

      कैसे लगते हैं शशि से मेरी धरा के नगीने |

अलौकिक दृश्यों के संग्रह संग्रहित होने लगे ,

इसरो के साथ हम भी मोदित होने लगे |

      अरे अचानक चन्द्रयान से टूट गया नाता था ,

      आर्यवर्त की जनता को यह पल कतई न भाता था |

जन –जन का मन विचलित पर धैर्यवान था ,

असफलता के क्षणों में भी आत्मविश्वास चढ़ा परवान था |

      विचारों को झंकृत करने वाला यह कैसा पल था ,

      विज्ञानं के चमत्कार का यह कैसा फल था |

चंद क्षणों में पतंग ओर डोर का रिश्ता टूट गया ,

ब्रह्माण्ड को रचने वाला फ़रिश्ता सा रूठ गया |

      गिर कर संभलना ही नियति की रीत है ,

      वसुधैव कुटुम्बकम ने दिखाई एकता की रीति है |

धरा से अंतरिक्ष का रिश्ता पुराना है,

ठाना है मन में एक और ‘विक्रम’ फिर वहीं पहुंचाना है |    

श्रीमती रश्मि माथुर
भारतीय स्टेट बैंक , क्षेत्रीय व्यवसाय कार्यालय कोटा
वरिष्ठ सहायक

                              *तुम कहते हो...... *

तुम कहते हो

कुछ लिखूँ

जिसमें  सिर्फ़ तुम हो,

हर शब्द जिसका,

सिर्फ़  तुमको समर्पित हो

पर

जब कभी

लिखने बैठती हूँ,

उभर आते हैं

रोजगार की तलाश में भटकते

बेरोज़गार युवाओं के

उमंगहीन  पीले से चेहरे


साम्प्रदायिकता की अग्नि में

जलते लोग


रोटी को तरसता बचपन

चिथड़ों में  लिपटा ,

सर्दी से काँपता मज़दूर


दहेज़ की फ़ेहरिस्त को पूरा करता,

असहाय   बेटी का बाप

हर बार

इन सबसे ध्यान हटाकर

लिखना चाहती हूँ  

मैं तुम्हारे लिए,

सिर्फ़ तुम्हारे लिए

पर,


बंद पलकों पे



सपनों की तरह

चले आते हैं ये लोग

फिर उठाती हूँ क़लम

लिखना चाहती हूँ

कुछ तुम्हारे लिए  

सिर्फ़ तुम्हारे लिए  


तभी,


कोई निर्भया आकर

लगता हैं पूछ रही हो

क्या मेरी चीख़ें,

मेरी अनकही वेदना,

विचलित नहीं कर देती तुम्हें ?


कैसे लिख सकती हो तुम

इस परिवेश में

कोई प्रणय गीत


और


फिर से

हाथो से छूट जाती हैं  क़लम

अब तुम्हीं  बताओ

इन सब से हट कर,

इन सब से बच कर


क्या लिखूँ

कैसे लिखूँ ,


जिसमें  सिर्फ़ तुम हो,

हर शब्द जिसका,

सिर्फ़  तुमको समर्पित हो|

नेहा अमेय रानडे
भारतीय स्टेट बैंक , प्रशासनिक कार्यालय कोटा
सहायक

 स्नेह 

कितना ज्यादा स्नेह है उनसे 

कैसे उन्हें बताउँगी,

लगता है, मुझको अब ऐसे,

मैं तो न बोल पाऊँगी ।।


मुस्कराहट देखनें उनकी 

थी तरसती आँखें मेरी 

ओझल जब हो जाते लगता 

कैसे ढूंड़ मैं पाऊँगी..

कितना ज्यादा स्नेह है उनसे 

कैसे उन्हें बताउँगी..


आनें की आहट को उनके 

मन की आंखें भापती हैं,

मन की घड़ी में पल पल,

उस घड़ी की राह नापतीं हैं 

पल लगतें हैं बरसों जैसे 

मुश्किल से मैं बिताउँगी..

कितना ज्यादा स्नेह है उनसे 

कैसे उन्हें बताउँगी..


रूठना उनका मुझें न भाता 

तीखा मीठा उन्हें खिलातीं हूँ 

जीतना उनके मन को मैं,

पसंदीदा खिलाके जानतीं हूँ,

मैं रुठूँ वह मना न पायें,

ज्यादा न रूठ पाऊँगी,

लगता है मुझको, अब उनसे,

यह भी न बोल पाऊँगी..

कितना ज्यादा स्नेह है उनसे 

कैसे उन्हें बताउँगी..


झगड़ा भी करतीं हूँ डटकर,

गलतियाँ सौ गिनवाती हूँ,

अपनें पर जब बात है आती,

भोली सी मैं बन जातीं हूँ,

स्नेह उन्हींसे, क्रोध उन्हीं पे,

खुशी से हार मनाऊंगी,

लगता है, मुझको अब उनसे,

मैं तो न बोल पाऊँगी..

कितना ज्यादा स्नेह है उनसे 

कैसे उन्हें बताउँगी..


साथ उन्हीं का, राह उन्हीं की,

हमराही सखा पतिदेव हैं,

धूप उन्हीं संग, छाँव उन्हीं संग 

जो भी है वह प्रेम है,

सैर उन्हीं संग, मन्झिल भी वह 

अनुसरण अंत तक करते जाऊँगी 

वहीं है मेरी अक्ष रेखा,

उन्हें कैसे बता पाऊँगी..

SIDDHARTH JANGID
CENTRAL BANK OF INDIA , REGIONAL OFFICE KOTA
ASSISTANT MANAGER

दिवाकर कुमार
ओरियंटल बैंक आफ कॉमर्स , मंडल कार्यालय , इंडस्ट्रियल एरिया, कोटा
प्रबंधक (राजभाषा)

शिवरीनारायण एक पौराणिक तीर्थ स्थल

छत्तीसगढ़ में बिलासपुर शहर के पास एक पौराणिक स्थल है।  जांजगीर-चांपा जिले में महानदी, शिवनाथ एवं जोक नदी के संगम पर यह मंदिर स्थित है। इस दर्शनीय स्थल की स्थापना लगभग 12 वीं शताब्दी में की गई थी। यह कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना कल्चुरी काल में की गई। दंडकारण्य में स्थित इस मंदिर की मान्यता स्थानीय लोगों में प्राचीन काल से है। 

राजा शबर की पुत्री शबरी की भगवान श्री राम के प्रति अनन्य निष्ठा के कारण राज भवन त्याग कर मतंग ऋषि के आश्रम में रहने लगी। इस ऋषि के आश्रम की ख्याति गुरुकुल के रूप में दूर-दूर तक फैली थी। यह गुरुकुल चित्रकूट में स्थित था। ऋषि अपने अंतिम समय में गुरुकुल की जिम्मेदारी विदुषी आचार्या शबरी को सौंपकर शरीर त्याग किए। मतंग ऋषि शबरी के हृदय में राम भक्ति का जोत जलाए रखे। 

जब भगवान श्री राम सीता की खोज में भटकते हुए आश्रम पहुंचे तो वृद्धावस्था में अपनी आंखों पर माता शबरी को विश्वास नहीं हो रहा था कि स्वयं प्रभु श्रीराम उनके सामने खड़े हैं। भगवान श्री राम ने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया था। श्री राम ने सबरी से सीता जी के संबंध में पूछा तो शबरी ने भगवान को पंपा सरोवर जाने के लिए सलाह दी। जहां उनकी मित्रता सुग्रीव से हुई। शबरी श्री राम के प्रति वात्सल्य भाव रखती थी। इसलिए भगवान श्री राम उसे माता जैसे भाव से ही दिया गया भोग स्वीकार किए। सीता हरण के पश्चात गिद्ध राज जटायु को पिता के समान एवं शबरी को माता जैसा सम्मान भगवान श्रीराम ने दिया। 

छत्तीसगढ़ में शबर नाम की एक जनजाति है। इस क्षेत्र में कोल एवं शबर जातियां पाई जाती है। वह आज भी अपने को शबरी की संतान समझते हैं। बस्तर में शबरी नाम की एक नदी भी प्रवाहित होती है।

अवनीश जैन
बैंक ऑफ बड़ौदा , क्षेत्रीय कार्यालय, कोटा
आयोजना अधिकारी

हिन्दी के ऑनलाइन शब्दकोश

आज इंटरनेट का दिन-प्रतिदिन इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। आज घर- घर मे उपलब्ध कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन आदि के माध्यम से इन्टरनेट तक की पहुँच में निरंतर इजाफ़ा हो रहा है। इन्टरनेट पर अनेक तरह की सुविधाएं, सूचना एवं ज्ञान का भंडार माउस के एक क्लिक पर उपलब्ध है। आजकल भाषा सीखने की दृष्टि से इन्टरनेट पर उपलब्ध शब्दकोशों का इस्तेमाल निरंतर बढ़ रहा है। अँग्रेजी में कई शब्दकोश इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं- जैसे ऑक्सफोर्ड, ब्रिटैनिका, एवं कैम्ब्रिज शब्दकोश। हिन्दी भी इस मामले में पीछे नहीं है, हिन्दी में उपलब्ध ऑनलाइन शब्दकोशों के संबंध में संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है:-

1.   www.arvindlexicon.com

अरविंद लेक्सिकन इंटरनेट पर हिन्दी शब्दों और अभिव्यक्तियों का सबसे बड़ा संकलन है।इसमें लगभग नौ लाख शब्द हैं और एक- एक शब्द के कई- कई पर्यायवाची दिए गए हैं। जरा कल्पना कीजिए, कि दुनिया के किसी भी शब्दकोश में ‘’कर्मठ’’ शब्द के कितने पर्याय बताए गए होंगे, 20 या 25 लेकिन यहाँ इस शब्द के 200 अँग्रेजी पर्याय और 500 से ज्यादा हिन्दी पर्याय हैं। इससे इसकी विशालता और उसे बनाने में इस्तेमाल हुई कल्पना शक्ति का पता चलता है। इसके तीन संस्करण फ्रीसंस्करण, प्रोफेशनल संस्करण एवं लाइब्रेरी संस्करण उपलब्ध हैं।

 

2.   www.Shabdkosh.com

हिन्दी और अँग्रेजी दोनों भाषाओं में शब्दों के अर्थ जानने के लिए शब्दकोश डॉट कॉम का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके डेटाबेस को तैयार करने में आम हिन्दी पाठकों का भी योगदान है, क्यूंकी यह साइट सबको नए शब्द और अर्थ सुझाने की छूट देती है। शब्दों के अर्थ के साथ- साथ पर्यायवाची, विशेषण, क्रियाएँ आदि भी सुझाए गए हैं।

हिन्दी के अलावा कुछ दूसरी भारतीय भाषाओं की डिक्शनरी भी उपलब्ध है।

 

3.   E-mahashabdkosh.cdac.in

भारत सरकार के तकनीकी संस्थान सी-डेक ने राजभाषा विभाग के लिए ई- महाशब्दकोश विकसित किया है। नाम से जाहिर है कि इसकी परिकल्पना बहुत बड़ी है।

 

4.   Dict.hindikhoj.com

हिन्दी और अँग्रेजी दोनों भाषाओं में शब्दों के अर्थ खोजने की सुविधा हिंदीखोज पर मौजूद है। पर्यायवाची शब्दों के प्रयोग के उदाहरण भी दिखाए जाते हैं, जिन उपयोगकर्ताओं को हिन्दी टाइपिंग नहीं आती है, वे रोमन कीबोर्ड के जरिए टाइपिंग की सुविधा का लाभ उठा सकते हैं।

5.   Shabdkosh.raftaar.in

रफ्तार बुनियादी रूप से हिन्दी सर्च इंजिन है, लेकिन इस पर भाषा से जुड़ी कई सुविधाएं भी मौजूद हैं। शब्दों के अर्थ खोजने के लिए सर्च सुविधा के साथ-साथ अल्फाबेटिकल लिस्ट का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। पाठक चाहें तो खुद भी नए शब्द सुझा सकते हैं।

 

द्वारा

अवनीश जैन

आयोजना अधिकारी

बैंक ऑफ बड़ौदा

क्षेत्रीय कार्यालय, कोटा 

ऋचा बैजल
सिंडिकेट बैंक , सब्जीमंडी कोटा
लिपिक

बड़ौदा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक कोटा द्वारा दिनांक २६.०६.२०१९ को आयोजित कविता लेखन प्रतियोगिता में चयनित होने पर अंतिम राउंड हेतु अपनी कविता प्रेषित कर रही हूँ .कृपया प्राप्त हो जाने पर सूचित करें :-

'जी ' चाहता है ....

 

कुछ पल के लिए सब कुछ भूल जाने को 'जी ' चाहता है

तितली बन कर उड़ने का सपना पंख पसारता है

'हूँ कुछ बड़ी और समझदार मैं '-कहते हैं सब यही

लेकिन अब 'नासमझी ' करने को 'जी ' चाहता है

 

 

ज़िन्दगी की गंभीरताओं को हंसी में उड़ाने को 'जी ' चाहता है

उस 'रब ' का शुक्रिया है हर -पल

कि अब मुस्कुराने को 'जी ' चाहता है

 

दिल की उमंगें 'कविता ' बन जाती हैं

तब उनको कागज़ पे  उतारने को 'जी ' चाहता है

मैं क्या हूँ क्यों हूँ ,कुछ जानूं मैं

अब कुछ नया कर जाने को 'जी ' चाहता है .

 

                 *जी = मन 

 

ऋचा बैजल

सिंडिकेट बैंक ,कोटा  


ज्योति अग्रवाल
बैंक ऑफ बड़ौदा , क्षेत्रीय कार्यालय, कोटा
राजभाषा अधिकारी

समय की मांग- डिजिटल बैंकिंग

परिचय:-

आजकल विज्ञापनों मे कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के माध्यम से पैसा भेजते हुए देखना बड़ा रोचक लगता है। कभी कभी यह रिश्तों को और आत्मीय स्वरूप देने मे भी सहायता करता है। रक्षा बंधन पर मीलों दूर बैठी बहन को राखी का उपहार देने के लिए अब मिलने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। डिजिटल माध्यम से उसी समय अपना स्नेह बहिन को भेज सकते हैं।

घर से दूर है और आत्मीय जनों को आपात स्थिति मे आर्थिक सहायता की आवश्यकता है तो पहले बैंक जाकर रुपये निकालकर , फिर मीलों तय करके परिजनों के पास खुद पहुचने की जरूरत नहीं। आप क्षणों मे उनकी सहायता कर सकते हैं।

यहाँ डिजिटल बैंकिंग सकारात्मक भूमिका निभाते हुए कई चीजों को आसान बनाती है।

1.  अब इस बात की चिंता करने की जरूरत नहीं है कि बैंक खुला हो।

2.  बैंक मे अवकाश होने न होने से आपकी जरूरत पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

3.   तुरंत सहायता प्रदान कर सकते है।

4.  समय की बचत

5.  ईंधन की बचत

6.  आने जाने मे लगने वाले श्रम ,की बचत

7.  अब बैंक की लाइनों मे लगने की आवश्यकता नहीं।

8.  पर्यावरण को बचाने मे सक्रिय भूमिका

9.  पेपरलेस बैंकिंग को बढ़ावा।

10.          कुल मिलाकर बैंक अब हर सामान्य व्यक्ति की मुट्ठी में।

भारत एक डिजिटल भुगतान लेस- कैश अर्थव्यवस्था के लिए परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। यह देखते हुए कि हमारी जनसंख्या का कुछ प्रतिशत हिस्सा ही कर का भुगतान करता है, इसलिए यदि बैंकिंग और कर प्रणाली अधिक से अधिक डिजिटल भुगतान के माध्यम से भुगतान करती है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था मे बेहतरी आएगी। इसके अलावा सार्वजनिक जीवन और शासन मे भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण नकदी मे लेन देन होना भी है। इसलिए एक लेस- कैश समाज की तरफ बढ़ते हुए इससे भ्रष्टाचार को दूर करने मे मदद मिलेगी, और नकदी के प्रयोग पर रोक लगेगी।

इसके अलावा नकदी का मुद्रण और इसका वितरण भी बेहद खर्चीला है।

 उभोक्ताओं को भी लेस कैश के कई लाभ हैं। एक रुपये से लेकर किसी भी राशि के लिए अब बिना कैश के डिजिटल भुगतान किया जा सकता है। हम 24 घंटे डिजिटल लेन देन कर सकते हैं, यहाँ तक कि छुट्टियों के दौरान भी।इसके अलावा सरकार ने देश मे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए कई उपायों की घोषणा की है जिससे यह एक ही प्रकार की सर्विस के लिए नकद लेन- देन के मुक़ाबले ज्यादा सस्ता होगा।

केवल पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं मे ही डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण अनुपात नहीं है, बल्कि केन्या और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों मे भी डिजिटल भुगतान का प्रयोग बड़ी मात्र मे किया जाता है। जबकि वहाँ की जनसंख्या ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं है।

केन्या की राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली के तहत 67 प्रतिशत लेन देन एम- पैसा के तहत किया जाता है।

कई रिपोर्टों मे यह बात सामने निकलकर आई है कि केन्या की महिलाओं द्वारा बड़ी मात्रा मे मोबाइल बैंकिंग का उपयोग करने से उन्हें वित्तीय सेवाओं को आगे बढ़ाने, लागत की कीमत कम करने और बचत मे वृद्धि करने की प्रेरणा मिली है। भारत को इन सफलता की कहानियों से सीख लेनी चाहिए, और भारत मे भी उनके अनुभवों का उपयोग करना चाहिए क्योंकि बड़ी संख्या मे युवा आबादी मोबाइल का प्रयोग कर रही है।

विभिन्न कदम

उपभोक्ताओं के लिए कई कदमों की घोषणा की गई है। जिनमे ईंधन खरीद पर छूट, बीमा प्रीमियम, सेवाकर मे छूट और कैश बैक आदि शामिल हैं।डिजिटल भुगतान के माध्यमों मे सुधार किया गया है , जो बहुत ही सुरक्षित, तेज और ग्राहकों के अनुकूल है। भीम एप और यूएसएसडी जैसे डिजिटल भुगतान के माध्यमों की शुरुआत की गई है, जिसमे लोगों को डिजिटल भुगतान के प्रति शिक्षित करने और इसे अपनाने के लिए मुख्य रूप से 100 शहरों मे डिजिधन मेलों का आयोजन किया गया।

व्यापारियों के लिए भी कई पहलुओं एवं कार्यक्रमों की शुरुआत की गई है। इस वित्त वर्ष तक बैंकों को अनिवार्य रूप से एक लाख नए पीओएस टर्मिनल स्थापित करने के लिए कहा गया है।। इन मशीनों के निर्माण पर शुल्क और करों को माफ कर दिया गया है। डिजिटल भुगतान पर एमडीआर एवं अन्य लेन देन शुल्कों को युक्ति संगत बनाया जा रहा है। और जल्द ही लेन- देन के लिए शुल्क अदायगी की एक नई व्यवस्था बनाई जाएगी। जो उच्च मात्रा और कम शुल्कों पर आधारित होगी।

छोटे और ग्रामीण व्यापारियों के लिए विशेष उपाय किए जा रहें हैं, जहां स्टेट बैंक ने इस तरह के टर्मिनलों पर होने वाले लेन देन के लिए एमडीआर शुल्कों पर कोई कर नहीं लगाने का प्रस्ताव दिया है। कई बैंक जल्द ही इसका पालन करेंगे।

प्रत्येक के लिए समाधान

भारत की आबादी की विशाल विविधता को देखते हुए सरकार ने विभिन्न वर्गों के लिए अलग अलग विकल्पों को विकसित किया है। हालांकि देश मे एक अरब से ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता हैं और केवल इसका एक तिहाई हिस्सा (370 मिलियन) ही मोबाइल इंटरनेट का प्रयोग करता है।

डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए भीम (यूपीआई) और ई वालेट जैसे डिजिटल माध्यमों का प्रयोग करने के लिए एक स्मार्ट फोन का होना जरूरी है। यूएसएसडी जो किसी भी मोबाइल मे जीएसएम नेटवर्क के साथ बगैर इंटरनेट के काम कर सकता है। वह लगभग उस 61 फीसदी जनसंख्या को कवर करता है, जो केवल सामान्य फीचर वाला फोन इस्तेमाल करती है।

इसके अलावा हमारे देश मे 78 करोड़ डेबिट कार्ड और एक अरब से ज्यादा आधार नं हैं। इन उपभोक्ताओं के लिए मोबाइल फोन और बिना मोबाइल फोन के जरिये एईपीएस और पीओएस समाधान की व्यवस्था की गई है।वरिष्ठ नागरिकों और अशिक्षित लोगों को इससे जोड़ने के लिये हमारे पास बैंकिंग कोरस्पोंडेंट मॉडल है जो ग्रामीण क्षेत्रों को कवर करेगा। जहां बैंकिंग कोरस्पोंडेंट जाकर वित्तीय सेवाओं का विस्तार करने मे मदद करेगा।

भीम एप और आधार पे

भारत इंटरफेस फॉर मनी (भीम) एक मोबाइल एप्लिकेशन है जो आपको यूपीआई का प्रयोग करके आपके भुगतान के लेन देन को आसान और तेज बनाता है। यह वोलेट्स की तुलना मे अधिक आसान है।हमें इसमे बैंक खातों की तरह थकाऊ विवरण नहीं देना पड़ता। हम इसके द्वारा सीधे बैंक से बैंक मे पेमेंट कर सकते हैं और केवल मोबाइल नं और भुगतान पते का उपयोग करके तुरंत पैसा एकत्र कर सकते हैं। इस एप को एन पी सी आई द्वारा शुरू किया गया था जो देश मे सभी खुदरा भुगतान के लिए एक अम्ब्रेला संगठन है। पिछले दस दिनों के दौरान 10 मिलियन से भी ज्यादा लोगों ने भीम एप को डाऊनलोड किया है।

आधार पे एईपीएस पर आधारित मॉडल है जो व्यापारियों के लिए है केवल मोबाइल फोन पर इस एप को इन्स्टाल करके और स्कैनर पर अपने फिंगर प्रिंट को दर्ज कराके व्यापारी सभी आधार आधारित खातों से भुगतान शुरू कर सकते हैं। इसके लिए कोई कार्ड या मोबाइल फोन या पीओएस मशीन की जरूरत नहीं है। भुगतान करने और इसे प्रमाणित करने के लिए केवल आधार नं और अंगूठे का निशान ही पर्याप्त है। यह भारत को तकनीकी रूप से आगे बढ्ने मे मदद करेगा।

यूएसएसडी को दुरुस्त करना

यूएसएसडी एक टेलिकॉम माध्यम है जो हमें विभिन्न भुगतानों के लिए एक साधारण फोन कॉल के जरिये हमारे बैंक के साथ सीधा संवाद स्थापित करता है। इसके लिए किसी इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती। इसके माध्यम से हम आसान तरीके से अपने प्रीपेड फोन की बकाया राशि को जांच सकते हैं। *99# एक मानक चैनल है जो सभी बैंको से संवाद स्थापित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

यूएसएसडी को दुरुस्त कर इसे यूपीआई प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत किया गया है। इसलिए कोई भी फीचर फोन ( जो भीम एप इन्स्टाल करने मे असमर्थ है )  भीम एप का प्रयोग करके किसी भी स्मार्ट फोन ( एक बैंक खाते के साथ जुड़ा हुआ हो) में पैसे का लेन देन कर सकता है। इस सुविधा से यूएसएसडी और यूपीआई जैसे मंचों द्वारा लेन देन को बढ़ावा देने मे मदद मिलेगी।

सुरक्षा चिंताएँ और उपभोक्ताओं का समाधान

सरकार ने पहले ही डिजिटल भुगतान मे सुरक्षा संबंधी मुद्दों की देख रेख के लिए एक समिति का गठन किया है। भारत मे कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पान्स टीम ( सीईआरटी-इन) नाम की एक अलग डिजिटल पेमेंट डिवीजन का गठन किया गया है।सभी एनपीसीआई प्रणालियों की सुरक्षा ऑडिट मे आवश्यक सुधार शुरू कर दिये गए हैं।

डिजिटल माध्यम से किए गए सभी भुगतान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत आते हैं। लेकिन किसी भी विवाद की स्थिति मे उपभोक्ता फोरम से संपर्क करने से पहले यह सलाह दी जाती है कि संबन्धित बैंक से संपर्क करें। डिजिटल माध्यम से होने वाले सभी भुगतानों का ब्यौरा रखा जा रहा है, ऐसे मे बैंकों के लिए विवादित लेन देन की सच्चाई को स्थापित करना बहुत आसान हो गया है। बैंकिंग लोकपाल की संस्था भारतीय रिजर्व बैंक से सभी नागरिक संपर्क कर सकते हैं। जो बैंकों को एक निश्चित अवधि के तहत विवादों को निपटाने का आदेश देता है।

अतएव यह स्वीकार करने मे कोई अतिशयोक्ति नहीं है की भारत को विकासशील देश से विकसित दिशा की ओर कदम बढ़ाने के लिए समय की मांग है- डिजिटल बैंकिंग।

 

लेखिका

ज्योति अग्रवाल

राजभाषा अधिकारी

कोटा क्षेत्रीय कार्यालय



ज्योति अग्रवाल
बैंक ऑफ बड़ौदा , क्षेत्रीय कार्यालय, कोटा
राजभाषा अधिकारी

                             j pic ज्योति अग्रवाल

                                                                राजभाषा अधिकारी, बैंक ऑफ                                                  बड़ौदा

                                                            कोटा क्षेत्रीय कार्यालय

 सुयोधन की व्यथा            

जी हाँ, सही पढ़ा आपने, सुयोधन (दुर्योधन नहीं) की व्यथा। यह तो कालखंड था, जिसने सुयोधन को दुर्योधन बना डाला। परंतु महाभारत का युद्ध और उसके भीषण परिणाम के पीछे क्या केवल दुर्योधन की अनुचित हठधर्मिता ही कारण रही, या पांडवों की ओर से भी कुछ कारक थे। युद्ध के अंतिम दिवस जब दुर्योधन अपनी अंतिम साँसे गिन रहे थे, तब भ्रातृत्व भावना से ओत-प्रोत धर्मराज युधिष्ठर जब उन्हें सांत्वना देने और अंतिम समय की पीड़ा को कम करने हेतु उनके पास गए, तो दुर्योधन का आक्रोश किस प्रकार युधिष्ठर के समक्ष प्रकट हुआ, वही इस काव्य मे प्रस्तुत है-

 

छल कपट थी जिसकी नीति, युद्ध में रहा जो रत।

थी सुमेरु जिसकी इच्छा, आज वो पड़ा है मृत।।

है अनोखी लीला विधाता, आज क्या दिखा रहा।

था जो शत्रु रक्त प्यासा, अब उसके समीप जा रहा।।

अंतिम घड़ी अंतिम विदा है, चंद सांसें चल रही।

शत्रु कराहता देख ले, जीवन की सांझ ढल रही।।

क्रोध से उबाल खाता, सुयोधन का उद्विग्न मन।

अंतिम घड़ी पर शत्रुता भी बढ़ती जाती है हर क्षण।।

धर्मराज को दोष दिया है, कि युद्ध हुआ है इसी कारण।

रक्त के रिश्ते कभी तेरे मन मे नहीं रहे पावन।।

राज्य की नीति है कहती, ज्येष्ठ पुत्र को राज मिले।

पर अन्धे थे, इसी लिए क्या, मेरे पिता गए थे छले।।

भाई की पत्नी है भावज, तो क्या उससे अपमान सहूँ।

वो मेरा उपहास करे, और मैं शांत बैठा रहूँ।।

त्याग देखा न किसी ने, मेरी माँ का सब चुप रहे।

मेरे पिता की विवशता पर, माँ के ही अश्रु बहे।

धर्म मर्यादा दिखाकर गुरु भी मुझसे छीन लिया।

और अब जतला रहे, जो किया नीति वश किया।।

मृत्यु के क्षण पास आकर, मेरे घाव क्यूँ छूए।

युद्ध का है मूल ये,

दु:ख का है कारण यही, मेरे पिता अन्धे क्यूँ हुए।

मेरे पिता अन्धे क्यूँ हुए।

 

 

 

श्रीमत रुपम कुमारी, पत्नी श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

नारी शक्ति : अधूरा सच

 

फख्र है हमें अपनी आजादी पर
अपने देश अपनी संस्कृति पर...
पर विश्लेषण कीजिए पुनः उस रास्ते का
जिससे गुजर कर पहुँचे हम इस मुकाम तक ...
कितना सा फर्क है उस जमाने में,

जब असूर्यपश्या होना  नारी का  थी गर्व की बात
और आज जब नारी सर्वोच्च शिखर पर पहुँची है...
पर कितनी?
बातें हैं ये अपवाद की और अपवाद से बनते नहीं सिद्धांत...
आज भी है बाहुल्य उन परिवारों का
जहाँ घुट्टी में पिलाया जाता है
आदर्श और शील सिर्फ नारियों को संस्कार के नाम पर...
ताकि जा कर पराये घर करें नाम रोशन
जो इंसान नहीं बन जाएँ मूरत संगमरमर की  अवगुण रहित...
जिंदगी बीत जाती है  पहले सीखने में
फिर अमल करने फिर सिखाने में...
वक्त ही नहीं बचता  कि जियें वो खुद के लिए
सपने देखें या साकार करें...
शायद आप स्मित हास्य के साथ सोच रहे होंगे
''
अजी कहोगी क्यों नहीं,
आखिरकार तुम भी उनमें से ही एक हो।''

श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

डिजिटल बैंकिंग में नए आयाम

 

आज जहाँ डिजिटल तकनीकें भारत में जन-जन तक पहुँच रही हैं, वहीं इसके विकास के चरणों की अक्सर अवहेलना कर दी जाती है कि कैसे अल्पावधि में ही भारत ने इस क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। डिजिटल आधारभूत संरचना के मजबूत होने से वित्तीय कार्यों में तीव्रता आई है। यही वजह है कि निकट भविष्य में महत्वपूर्ण उत्पादकता विकास का अनुमान लगाना संभव हो सका है। भारत के डिजिटल ढाँचे की नींव मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिकी है जिसे 'जैम त्रिमूर्ति'(JAM TRINITY) कहा जाता है। ये तीन स्तम्भ हैं- जन धन बैंक खाते, आधार जैवमितीय प्रणाली और मोबाइल संचार का विकास। इन तीनों प्रमुख घटकों के अलावा कुछ और तत्व भी डिजिटल संरचना को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख हैं- पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) एवं यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI)

PFMS जहाँ प्रसंस्करण, निगरानी, प्रवर्तन, लेखांकन, विवेचना और रिपोर्ट तैयार करने में मददगार साबित हो रहा है वहीं UPI एक ऐसा मंच है जहाँ समान या विभिन्न बैंकों के किसी भी दो खतों में वित्त का वास्तविक समय हस्तांतरण कर सकते हैं। UPI राष्ट्रीय भुगतान कॅारपोरेशन के द्वारा निर्मित और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित की गई है। भारत के लगभग सभी बैंकों के राष्ट्रीय, राजकीय, चालू और व्यावसायिक खाते इससे जुड़कर संचालित होने में सक्षम हैं। UPI की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा प्रेषक और प्राप्तकर्ता भिन्न मोबाइल एप का प्रयोग करते हुए भी, इसके विभिन्न प्रयोक्ता इंटरफेस की सुविधा के तहत आसानी से विनिमय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के प्रयोग से बिना किसी माध्यमिक हस्तक्षेप के सरकार सीधे राज्य सरकार या किसी भी अपेक्षित व्यक्ति विशेष तक वित्तीय सहायता प्रदान करने में सक्षम है। इन वित्तीय माध्यमों से वर्तमान में क्रेडिट और वीसा कार्डों की भाँति कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता, जिसकी वजह से यह संभावना बन रही है कि यह व्यवस्था निकट भविष्य में विभिन्न प्रकार के कार्डों को विस्थापित कर दें।  गैर-सरकारी विभागों ने इस व्यवस्था को अपने व्यावसायिक उपयोग और उपभोक्ता विनिमय के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया है तथा इसके लिए विभिन्न UPI आधारित उपादानों और वॅालेट का उपयोग बहुतायत से कर रहे हैं । दूरसंचार जगत में जीओ नेटवर्क के आ जाने से तीव्र गति इंटरनेट की दर में गिरावट की वजह से भारत हालिया कुछ वर्षों में दुनिया के सर्वाधिक डाटा उपभोक्ताओं में से एक बन गया है ।  

गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क(GSTN) भी भारत के डिजिटल ढाँचे के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरा है, जिसमें एक करोड़ से भी अधिक टैक्स भुगतानकर्ताओं को सूचीबद्ध किया गया है। बैंक इस सुविधा का उपयोग ऋण व्यवसाय के मूल्यांकन के लिए भी कर रहे हैं। हाल ही में एक ऑनलाइन ऋण स्वीकृति मंच बनाया गया है जो सरकारी बैंकों को छोटे व मध्यम आकार के ऋणों को व्यवस्थित करने में मदद कर रहा है ।  GSTN द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों की सहायता से एक घंटे से भी कम समय में ऋण प्रसंस्करण एवं स्वीकृति की प्रक्रिया को पूर्ण किया जा सकता है ।

निष्कर्षतः डिजिटल वातावरण के विकास में कुछ प्रतिकूल अवरोध मौजूद होने के बावजूद हालिया वर्षों में किए जा रहे अथक प्रयास रंग ला रहे हैं और अल्पावधि में ही डिजिटल संरचना और व्यावसायिक प्रगति में अभूतपूर्व सफलता दर्ज की गई है जो भारत में विदेशी तकनीकों और निवेशकों के आगमन की भी असीम संभावनाओं के द्वार खोल रहा है ।

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन

 

वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना|

वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना|

वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना|

वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना|

वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना|

वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना|

 

वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना|

वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना|

वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना|

वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना|

वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना|

वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना|

वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना|

वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना|

वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना|

वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना|

यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें  भरना|

 

जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं|

 

क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ?

 

क्यूँ ........ आखिर क्यूँ !!!

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है


आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है,
पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है।
नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है,
पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है।

बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे,
ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है।

सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी,
कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है।

नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ,
पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है।

मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर,
पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है।

यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है,
पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है।

हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान,
पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है।

भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से,
नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है


आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है,
पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है।
नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है,
पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है।

बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे,
ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है।

सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी,
कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है।

नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ,
पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है।

मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर,
पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है।

यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है,
पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है।

हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान,
पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है।

भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से,
नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

पहचान

 

ख़ुद को बना चट्टान तूकर माह को रमज़ान तू।

माता, बहिन, पत्नी, पुत्री, ख़ुद की बना पहचान तू।

शमशीर ख़ुद को तू बना, डर तोड़ बन तूफान तू।

है देवियों का रूप तू, गीता एवं कुरआन तू।

जो मौत को भी मात दे, उस देश का गुण-गान तू।

हैवान का भुगतान हो, आगे बड़ा फ़रमान तू।

कु. पूर्वी खत्री
भारतीय स्टेट बैंक , प्रशासनिक कार्यालय
उप-प्रबंधक

बैंकों में बढ़ता एनपीए : कारण और निवारण

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बैंक रीढ़ की हड्डी की तरह हैं। भारत की अर्थ व्यवस्था , विभिन्न विभागो मे हमारे विकास एवम विस्तार के लिए जिस वित्तीय सहायता की आवश्यकता है वो केवल बैंक ही दे सकते हैं। ऐसे में बैंकों की बढ़ रही गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) केवल बैंकों के लिए ही नहीं, समूची अर्थ व्यवस्था के लिए नुकसानदेह हैएनपीए के विषय मे, इसके कारण आदि के बारे मे गहराई से चर्चा करने से पूर्व हमे यह समझना चाहिए की क्या है एनपीए।

क्या है एनपीए?

बैंक का वो कर्ज जो डूब गया हो और जिसे फिर से वापस आने की उम्मीद नहीं के बराबर हो उसे एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) कहा जाता है। अमूमन अगर बैंक को कर्ज की किश्त 3 महीने पर नहीं आती है तो उस अकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया जाता है। हमारे बैंकों का 10 फीसदी से ज्यादा कर्ज एनपीए है। बढ़ता एनपीए बैंकों के ऋण देने की क्षमता को प्रभावित करता है तथा उनके मुनाफे में कमी आती है।  

बैंकों का पैसा डूबने का सीधा मतलब है कि बैंक के पास कर्ज देने की रकम में कमी, और कर्ज देने की रफ्तार में कमी का मतलब है अर्थव्यवस्था में सुस्ती और अर्थ अयवस्था का हमारे विकास पर क्या प्रभाव इससे हम सब भली भांति अवगत हैं।

अतः यह स्पष्ट है की एनपीए हमारे बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बहुत ही बड़ी चिंता का विषय है तथा इसका निवारण अनिवार्य है। परंतु इसके निवारण पर चर्चा करने का मतलब तभी है जब हम समझ ले की भारतीय बैंकों मे बढ़ते एनपीए के प्रमुख कारण क्या है?

एनपीए के कारण

आज हमारे बैंकों मे मुख्यतः औद्योगिक क्षेत्रो विशेषतः मेटल, सीमेंट, कंस्ट्रक्शन, टेक्सटाइल, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि सैक्टर मे दिये गए लोन मे एनपीए बढ़ा है।एनपीए में उद्योग जगत और बड़ी कंपनियों का योगदान सबसे ज्यादा है।

एनपीए के कुछ प्रमुख कारण निम्न हैं :

1.       बड़ी परियोजनाओ व सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न योजनाओ कि सफलता को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया कर्ज एनपीए के प्रमुख कारणो मे से एक है।परियोजना के पूरा होने में विलम्ब के कारण ब्याज तथा मूलधन की किश्त भुगतान में देरी होती है, जिससे लोन एनपीए श्रेणी मे आ जाता है

2.       कर्ज माफी के बाद कृषि क्षेत्र मे भी एनपीए कि स्थिति गंभीर हो गयी है। किसान अगली कर्ज माफी का इंतज़ार करते हैं तथा समय पर अपनी बकाया राशि व किश्त का भुगतान नही करते।

3.       ब्याज दरों में बृद्धि के कारण किश्त भुगतान में कठिनाई।

4.       बाजार में मौजूद अनिश्चितता के कारण जिन लोगों ने ऋण लिए हैं उनके द्वारा ऋण न चुका पाना।

5.  जान बूझकर ऋण न चुकाने (willful defaulter)  वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होना और ऐसे बकायेदारों के खिलाफ राजनीतिक दखल के कारण पर्याप्त कार्यवाही न हो पाना।

 

ध्यान देने वाली बात यह है कि बढ़ते एनपीए वाले क्षेत्रो मे ज़्यादातर क्षेत्र वो हैं जिनकी सेहत देश की विकास दर से जुड़ी हुई है। मतलब यह कि विकास दर अगर तेज होती है तो इन सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों की सेहत बेहतर होती है और लोन चुकाने की क्षमता भी। अतः यह बात साफ है कि बैंकों के एनपीए कम करने का अचूक उपाय है देश कि विकास मे वृद्धि हो, परंतु यह वृद्धि भी कई कारणो पर निर्भर करती है।

तो आए अब बैंकों मे बढ़ते एनपीए को कम करने के संभव उपायो पर चर्चा कर लें।

 

एनपीए के निवारण

·         बैंकों का रिकैपिटलाइजेशन इसका एक उपाय है। बैंकों कि माली हालत सुधारने के लिए भारत सरकार ने समय समय पर बैंकों को अतिरिक्त पूंजी देने कि घोषणा कि है। पुनर्पूंजीकरण बैंकों के पूंजी आधार को मजबूत करेगा। इससे बैंकों का मुनाफा बढ़ेगा तथा रकम का प्रवाह घटने के खतरे को कम कर उन्हें दिवालिया होने से बचाया जा सकेगा।

·         समय-समय पर पुनर्पूंजीकरण के साथ सरकारी बैंको के कामकाज को और पारदर्शी बनाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

·         सरकार और आरबीआई की सहभागिता से समता अंश योगदान के जरिए एक संपत्ति पुनर्निमार्ण कंपनी (एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन कंपनी) का गठन हो, जो बैंकिंग क्षेत्र से एनपीए को खत्म कर सके।

·         किसी कंपनी को ऋण स्वीकृत करने से पहले उसकी वित्तीय स्थिति और परियोजना की व्यावहारिकता की निष्पक्ष जांच हो तथा बगैर पर्याप्त सुरक्षा और बंधक के कोई ऋण स्वीकृत न हो।

अतः यह बात साफ है कि बैंकों मे एनपीए कैंसर बीमारी के समान है , परंतु लाइलाज नही। बैंकों मे भी इसके निवारण करने कि ओर रुचि बढ़ रही है जो कि एक अच्छा संकेत है। यदि सही गति एवम पारदर्शी नीतियो से , सरकार के बेवजह हस्तक्षेप पर रोक लगा के ,मानव संसाधनो की बदोतरी आदि कदमो के साथ आगे बढ़ा जाए तो एनपीए पर निश्चित रूप से काबू पाया जा सकता है। यह राह कठिन जरूर है, परंतु यह हमे देश की तरक्की एवम विकास की ओर ले कर जाती है। अतः यह सही समय है की इस समस्या को गंभीरता से लें तथा ऐसी नीतिया बनाई जाए जो एनपीए पर रोक लगाने मे सक्षम हो।

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना| वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना| वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना| वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना| वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना| वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना| वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना| वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना| वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना| वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना| वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना| वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना| वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना| वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना| वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना| वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना| यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें भरना| जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं| क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ? क्यूँ ........ आखिर क्यूँ !!!

श्रीमती रुपम कुमारी पत्नी श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

नारी शक्ति : अधूरा सच फख्र है हमें अपनी आजादी पर अपने देश अपनी संस्कृति पर... पर विश्लेषण कीजिए पुनः उस रास्ते का जिससे गुजर कर पहुँचे हम इस मुकाम तक ... कितना सा फर्क है उस जमाने में, जब असूर्यपश्या होना नारी का थी गर्व की बात और आज जब नारी सर्वोच्च शिखर पर पहुँची है... पर कितनी? बातें हैं ये अपवाद की और अपवाद से बनते नहीं सिद्धांत... आज भी है बाहुल्य उन परिवारों का जहाँ घुट्टी में पिलाया जाता है आदर्श और शील सिर्फ नारियों को संस्कार के नाम पर... ताकि जा कर पराये घर करें नाम रोशन जो इंसान नहीं बन जाएँ मूरत संगमरमर की अवगुण रहित... जिंदगी बीत जाती है पहले सीखने में फिर अमल करने फिर सिखाने में... वक्त ही नहीं बचता कि जियें वो खुद के लिए सपने देखें या साकार करें... शायद आप स्मित हास्य के साथ सोच रहे होंगे ''अजी कहोगी क्यों नहीं, आखिरकार तुम भी उनमें से ही एक हो।''

सुश्री रचना सचदेवा, पुत्री श्री नरेश सचदेवा
पंजाब नैशनल बैंक , भीमगन्ज मंडी, कोटा
विशेष सहायक

याद आते हैं वो बचपन के दिन वो साईकल ले कर बाहर चले जाना, और फिर मिट्टी से लथपथ कपड़ों में घर वापस आना| वो मम्मी का फिर जोर से डाँट लगाना, और फिर हमारा जोर से रोने लग जाना| वो पापा का फिर प्यार से चुप कराना, टॉफी का लालच देकर हमारे चेहरे पर हँसी लाना| वो स्कूल के दिन देरी से उठकर स्कूल के लिए भागना, और छुट्टी वाले दिन खुद ही जल्दी उठ जाना| वो टेढ़ी-मेढ़ी जली रोटियाँ बनाना और फिर वही दादा-दादी को खिलाना| वो रास्ते में पकड़ा-पकड़ी खेलते हुए जाना, और फिर धड़ाम से गिरकर घुटनों का छिल जाना| वो स्कूल ना जाने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाना, और कुछ देर बाद अचानक खेलने के लिए भाग जाना| वो किसी दोस्त को छोटी सी बात पर गुस्सा दिला जाना, और फिर उसे टॉफी और सॉरी कार्ड देकर मनाना| वो क्लास का मॉनिटर बन जाना, और फिर अध्यापक के जाने पर सहपाठियों को रौब दिखाना| वो खिलौनों के टूटने पर पूरे घर में उधम मचाना, और फिर वैसा ही खिलौना बाज़ार से खरीद कर लाना| वो गोले वाले अंकल को जोर से आवाज़ लगाना, और दो-तीन गोले एकसाथ खाकर गले का बिगड़ जाना| वो ऑटो में कोने वाली सीट के लिए दोस्तों से झगड़ जाना, और ज्यादा शोर मचाने पर अंकल की डाँट खाना| वो बड़ों के सामने भोला भला बन जाना, और छोटों के सामने अपनी दादागिरी दिखाना| वो साँप-सीढ़ी खेलने बैठ जाना, और हारने पर खेल बिगाड़ कर भाग जाना| वो दीदी को ज़ोर से एक थप्पड़ मार जाना, और फिर रो-रोकर उन्हें खेलने के लिए मनाना| वो बारिश में छम–छम कर नहाना, और फिर दो दिन के लिए तेज़ बुखार का आ जाना| यूँ बैठे-बैठे इन पलों को याद करना, कभी आंसुओं का छलकना तो कभी चुपके-से आहें भरना| जब बच्चे थे तब फुर्र से बड़े होना चाहते थे, और अब बड़े होकर अन्दर के बच्चे को खोज रहे हैं | उस छोटे से पावन मन में जो मैल भर गया है, आज उसे साफ़ करने के लिए अपने बचपन को ख़ोज रहे हैं| क्यूँ हम चाहकर भी बच्चे नहीं बन पाते हैं, क्यूँ वो मस्ती के दिन चाहकर भी वापस नहीं ला पाते हैं ? क्यूँ आखिर क्यूँ ......

श्री राजीव कुमार सिंह
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
सिंगल विंडो ओपेरटर - बी (राजभाषा प्रेरक)

डिजिटल बैंकिंग में नए आयाम आज जहाँ डिजिटल तकनीकें भारत में जन-जन तक पहुँच रही हैं, वहीं इसके विकास के चरणों की अक्सर अवहेलना कर दी जाती है कि कैसे अल्पावधि में ही भारत ने इस क्षेत्र में लंबी दूरी तय की है। डिजिटल आधारभूत संरचना के मजबूत होने से वित्तीय कार्यों में तीव्रता आई है। यही वजह है कि निकट भविष्य में महत्वपूर्ण उत्पादकता विकास का अनुमान लगाना संभव हो सका है। भारत के डिजिटल ढाँचे की नींव मुख्यतः तीन स्तंभों पर टिकी है जिसे 'जैम त्रिमूर्ति'(JAM TRINITY) कहा जाता है। ये तीन स्तम्भ हैं- जन धन बैंक खाते, आधार जैवमितीय प्रणाली और मोबाइल संचार का विकास। इन तीनों प्रमुख घटकों के अलावा कुछ और तत्व भी डिजिटल संरचना को मजबूत बनाने में मददगार साबित हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख हैं- पब्लिक फाइनेंस मैनेजमेंट सिस्टम (PFMS) एवं यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI)। PFMS जहाँ प्रसंस्करण, निगरानी, प्रवर्तन, लेखांकन, विवेचना और रिपोर्ट तैयार करने में मददगार साबित हो रहा है वहीं UPI एक ऐसा मंच है जहाँ समान या विभिन्न बैंकों के किसी भी दो खतों में वित्त का वास्तविक समय हस्तांतरण कर सकते हैं। UPI राष्ट्रीय भुगतान कॅारपोरेशन के द्वारा निर्मित और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रोत्साहित की गई है। भारत के लगभग सभी बैंकों के राष्ट्रीय, राजकीय, चालू और व्यावसायिक खाते इससे जुड़कर संचालित होने में सक्षम हैं। UPI की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसके द्वारा प्रेषक और प्राप्तकर्ता भिन्न मोबाइल एप का प्रयोग करते हुए भी, इसके विभिन्न प्रयोक्ता इंटरफेस की सुविधा के तहत आसानी से विनिमय कर सकते हैं। इस प्रक्रिया के प्रयोग से बिना किसी माध्यमिक हस्तक्षेप के सरकार सीधे राज्य सरकार या किसी भी अपेक्षित व्यक्ति विशेष तक वित्तीय सहायता प्रदान करने में सक्षम है। इन वित्तीय माध्यमों से वर्तमान में क्रेडिट और वीसा कार्डों की भाँति कोई अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता, जिसकी वजह से यह संभावना बन रही है कि यह व्यवस्था निकट भविष्य में विभिन्न प्रकार के कार्डों को विस्थापित कर दें। गैर-सरकारी विभागों ने इस व्यवस्था को अपने व्यावसायिक उपयोग और उपभोक्ता विनिमय के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया है तथा इसके लिए विभिन्न UPI आधारित उपादानों और वॅालेट का उपयोग बहुतायत से कर रहे हैं । दूरसंचार जगत में जीओ नेटवर्क के आ जाने से तीव्र गति इंटरनेट की दर में गिरावट की वजह से भारत हालिया कुछ वर्षों में दुनिया के सर्वाधिक डाटा उपभोक्ताओं में से एक बन गया है । गुड्स एंड सर्विस टैक्स नेटवर्क(GSTN) भी भारत के डिजिटल ढाँचे के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरा है, जिसमें एक करोड़ से भी अधिक टैक्स भुगतानकर्ताओं को सूचीबद्ध किया गया है। बैंक इस सुविधा का उपयोग ऋण व्यवसाय के मूल्यांकन के लिए भी कर रहे हैं। हाल ही में एक ऑनलाइन ऋण स्वीकृति मंच बनाया गया है जो सरकारी बैंकों को छोटे व मध्यम आकार के ऋणों को व्यवस्थित करने में मदद कर रहा है । GSTN द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों की सहायता से एक घंटे से भी कम समय में ऋण प्रसंस्करण एवं स्वीकृति की प्रक्रिया को पूर्ण किया जा सकता है । निष्कर्षतः डिजिटल वातावरण के विकास में कुछ प्रतिकूल अवरोध मौजूद होने के बावजूद हालिया वर्षों में किए जा रहे अथक प्रयास रंग ला रहे हैं और अल्पावधि में ही डिजिटल संरचना और व्यावसायिक प्रगति में अभूतपूर्व सफलता दर्ज की गई है जो भारत में विदेशी तकनीकों और निवेशकों के आगमन की भी असीम संभावनाओं के द्वार खोल रहा है ।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

नफ़रत मिटाना दरकार है आज कल दुनिया नफ़रत की खरीददार है, पर कोई नहीं जिस को इंसानियत से प्यार है। नन्ही जान के जिस्म से लहू बेतहाशा बह रहे है, पर जैसे नादान परिंदों की जान लेना इंसानों का रोज़गार है। बेगुनाह लोगों की जान लेना रिवाज़ बन गया हो जैसे, ख़ुदा भी क्या करे जब लोगों के बीच दर-ओ-दीवार है। सुकून से चल रही है ज़िन्दगी अपनी, कभी उनके लिए भी दुआ करो जिनके घर आफत का बाज़ार है। नन्हे जिस्मों के टुकड़े लिए खड़ी है इक माँ, पर कोई नहीं जिसमे उस माँ के ज़ख्मों को मिटाने का इख़्तियार है। मज़ार सा बनता जा रहा है जन्नत-ऎ-कश्मीर, पर तीमारदारी में दोनों मुल्क ना-चार है। यहाँ हर तरफ तानाशाहों की बस्ती है, पर लोग भी अपनी आवाज़ उठाने में लाचार है। हैवान बनता जा रहा है दिन-ब-दिन इन्सान, पर कोशिश-ऎ-अमन-ओ-अमान में लोग ना-चार है। भारत माँ की कोख भी ज़ख़्मी है इन हैवानों से, नन्हे जिस्मों के दर्द-ऎ-ज़ख़्म को 'अक्स', मिटाना दरकार है।

सुश्री अक्षिता गुप्ता, पुत्री श्री मधुसुदन गुप्ता
पंजाब नैशनल बैंक , इंडस्ट्रियल एस्टेट, एरोड्रोम सर्किल, कोटा
अधिकारी

पहचान ख़ुद को बना चट्टान तू, कर माह को रमज़ान तू। माता, बहिन, पत्नी, पुत्री, ख़ुद की बना पहचान तू। शमशीर ख़ुद को तू बना, डर तोड़ बन तूफान तू। है देवियों का रूप तू, गीता एवं कुरआन तू। जो मौत को भी मात दे, उस देश का गुण-गान तू। हैवान का भुगतान हो, आगे बड़ा फ़रमान तू।

नेहा अमेय रानडे
भारतीय स्टेट बैंक ,
वरिष्ठ सहायक

जिंदगी तू ही बता, कैसी है तू ? कभी फूलों सी सुंदर
कभी काँटों सी सख्त है,
कभी रिमझिम बरसात सुहानी
कभी अंगारों का तख्त है ।
कभी सजतें मेले, मुस्कानों के तुझमें
कभी सन्नाटें, बेवक्त है,
कभी लहराती है, विजयपताका
कभी गहरी, शिकस्त है ।
कहीं कोई बिछड़ जाता है तुझसे
कहीं नाता नया बनाता है,
आने-जाने की कहानी सारी,
तेरा वक्त ही, सुनाता है ।
भूल न जाऊँ भगवान को अपने
इतना ही, सुख देती है,
विश्वास करूँ, अपने कर्मों पर
इसलिए दु:ख भी, देती है ।
उम्मीदों से हरा-भरा है
तेरा आँगन सुनहरा,
बच्चों की किलकारी सुनकर
धुल जाता है, मन भी मैला ।
आसमानी ऊंचाई भी तेरी
समुंदर की गहराई भी,
अपूर्तता का मातम भी तेरा
खुशियों की, शहनाई भी ।
जब लगती तू, सरल सहज है
नया मोड दिखलाती है,
गिरते-उठते चलना सीखूँ
तभी दौड़ तू, लगाती है ।
अदना सा मैं बालक तेरा
तुझें, मैं, न समझ पाऊँ,
तेरे अद्भुत अनुभवों से
सींख मैं, लेना चाहूँ,
सींख मैं, लेना चाहूँ ।